गांव-गांव में पारंपरिक व मनमोहक डंडा लोक नृत्य की धूम

कोरबा। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक डंडा नृत्य इन दिनों गांव-गांव में किया जा रहा है। बांस के डंडों पर आधारित यह नृत्य छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध और पारंपरिक लोक नृत्य है। जनजातीय में प्रचलित इस नृत्य में पुरुषों की ओर से 10, 20 व 30 संख्या में समूह बनाकर नृत्य करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डंडा नृत्य पुरुषों के सर्वाधिक कलात्मक और मनपसंद नृत्यों में माना जाता है। हर कोई डंडे एक दूसरे से टकराते हैं, जिससे मनमोहक ध्वनि निकलती है।

डंडों से नृत्य करने वालों के अलावा भी एक समूह होता है, जो नृत्य करने के लिए संगीत गायन करते हैं। इसके साथ ही समूह में एक व्यक्ति नृत्य को ताल और गति देता है, उस व्यक्ति के कार्य को कुटकी देना कहते हैं। इसके अलावा समूह में एक मादर, ढोल, झांझ, मंजीरा, हारमोनियम, बांसुरी बजाने वाले और एक व्यक्ति तिरली बजाता है। मनमोहक मधुर ध्वनि ही इस नृत्य की विशेषता है। डंडा नाच एक गोलाकार आकार में किया जाता है।